Monday, February 28, 2011

पत्तियां

पेड़ों पर लगी असंख्य पत्तियां
अब कुछ पीली पड़ने लगी थीं
हवा के झोंके कमज़ोर समझ
उन्हें गिराने में प्रयासरत थे
मेरा उत्साह देख वे अपनी
फीकी हंसी के साथ बोलीं
कब तक यों खिलखिलाओगे
समय की मार की समझ
तुममें अभी नहीं आई शायद
मैंने संजीदा सा उत्तर दिया
समय की मार के डर ने
तुम्हें जीना ही भुला दिया
और तुम पीली पड़ गई हो
समय से पहले ही तुम्हारी
जिजीविषा समाप्तप्राय हुई
मैं समय का सामना करूँगा
तभी जब आवश्यकता होगी

एक क़तरा

ज्यों ही एक क़तरा पानी का
उनकी आँखों से टपक पड़ा
मन भीग सा गया था मेरा
मानो समंदर के बीच का
कोई तूफान इधर आया हो
कितनी आसानी से मगर
उसने पोंछकर छुपा डाला
एक पल में उस आंसू को
मानो सा उलाहना दिया हो
छुपाये रखने के व्यवहार व
मेरी भावनाओं, अंदाज़ को

क़ातिलाना

उसी हिजाब के पीछे है आज भी छुपी
मेरी जुस्तजू आज भी खामोश यहाँ
जिसकी सूरत तक मैंने कभी देखी नहीं
माफ़ करना मेरी दुनियां के खैरख्वाहो
मैंने तुम में कभी बन्दगी ही देखी नहीं
जिनकी क़ातिलाना सी लगती हैं नज़र
उनकी आँखों में वो चमक देखी नहीं
आज भी उस सूरत का इंतजार मुझे
जिससे मेरी दोस्ती कभी हुई ही नहीं

Sunday, February 27, 2011

'राजनीतिक समझ'

सदाचार की ही बातें करने वाले
अब एक नई आवाज़ उठा रहे हैं
भ्रष्टाचार के खिलाफ नेतृत्व की
उनकी मुहिम को देख कर मुझे
आशा की किरण तो दिखती है
किन्तु एक डर सा भी लगता है
हमेशा की तरह ही क्या मालूम
ये भी एक मरीचिका सिद्ध न हो
किसी 'राजनीतिक समझ' के तहत
जहाँ एक दुसरे की पीठ खुजाते
वे जनता को ठेंगा ही दिखा दें
फिर भी मैं आशावान ज़रूर हूँ
एक चेतना जगाना भी ज़रूरी है

Friday, February 25, 2011

Welcome

I found you so inviting
Presence now so soothing
Your flow is comforting
Blowing the wanted thing
My body you were touching
Simply great was feeling
Was neither hot nor cold
Just right was the mixing
Loved yours everything
Even hardships mitigating
I know, people find you lusty
Fragrances around smelling
Leaves and flowers budding
Happiness and joy around
Welcome the wind of spring

Thursday, February 24, 2011

फलसफे

उनकी नज्मों को पढ़ लेने से यूँ लगा
हमें तो उल्फत बस कभी हुई ही नहीं
उनकी बेवाकी को देख के यूँ लगा
हमने जुबान ये कभी खोली नहीं
क़ह्क़हों को उनके सुना तो लगा
हम कभी जी भर के हँसे भी नहीं
हसरतें उनकी देख के लगने लगा
हमने तो कभी कुछ चाहा ही नहीं
इश्क के फलसफे उनके पढ़के लगा
हमारी तालीम अभी शुरू ही न हुई
लाख कोशिशों पर उन्होंने क़बूला
ये नज्में ख़ुद पे फ़क़त लागू न हुईं

Wednesday, February 23, 2011

दान

आज बेझिझक कह सकता हूँ
दिल और जान दोनों कर दूंगा
निसार तेरे सिर्फ एक कहने पर
कोमा में कब से है बसा दिल
जान कौन सी बचनी है यूँ भी
ये आई सी यू लगता है वाकई
क्या मस्त जगह होती है,जहाँ
लोग ऐसे वादे कर सकते हैं
जो खुद बखुद निभ जायेंगे
चाहो तो दिल दान में दे दो
क्या मालूम फिर धड़कने लगे
किसी और के काम आ जाये

Different World

She grew as a pretty girl
Chirpy; and full of life
Always seen in laughter
Was also very popular
A real emotional person
Always very sentimental
She had her perceptions
Of the people and World
She could not sustain most
In the realities real World
She became very depressed
With people and their ways
Finding faults with everyone
Slowly she started realizing
The two Worlds are there
Real World is way different
Expected one is another
But both are important too
Behavior of the people also
Vacillates between the two

अपने आप

मुझे गुरेज़ था परेशानियों से
वही मेरे घर बसर कर गईं
लाख टालना चाहा था मैंने
पर फिर भी वो यहीं पसर गईं
कर लिया मैंने भी समझौता
तो शायद वे भी कुछ डर गईं
या फिर लोगों की दुआएं ही बस
ऐसा कुछ असर सा कर गईं
जिन घड़ियों का था डर बहुत
वो अपने आप ही गुज़र गईं

At the end of the day!

I was then tired of all my efforts
Those many, seeking the solace
Around me and in several things
People, money, circumstances
From the entertainments, travel
Pursuance of all my ambitions
Both hidden and explicit ones
It wasn’t easy to get the solace
Nor the happy frame of mind
Then arrived thoughts maturing
Understanding of worldly things
Realities of all and everything
Solace came to me from within
It wasn’t so hard to have found
But the path was longer indeed
It was solace all around me then
It was worth travelling the paths
After all, at the end of the day!

Monday, February 21, 2011

Precious Moments

When I wanted you around
You were often not there
To be present by my side
I was looking for a shoulder
To cry or to feel the warmth
In my happy and sad moments
As I had always looked for
Our togetherness at all times
In spite of the circumstances
I was angry, anguished, appalled
At times for no sound reasons
May be I was just missing you
Without even ever realizing
You may be in the same boat
Now I can appreciate and find
It wasn’t anyone’s fault
But circumstances responsible
And the shadows of livelihood
That came in between and around
Our precious moments of lives

किंकर्तव्यविमूढ़

उस दिन हमेशा को मैंने
जाने की ठान ही ली थी
फैसले की घड़ी आ गई थी
किसी की आवाज़ ने मगर
मेरे क़दमों को थाम लिया था
एक बार फिर से आज भी
किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई थी
उसके भोले वचनों के साथ
उसके गाल पर टपकते हुए
मोती से आंसू आज फिर
मेरे अश्रुओं पर भारी पड़े थे
मुझे अब उसी की बहाली में
अपने संघर्ष और कर्तव्य की
पराकाष्ठा दिखाई दे रही थी

Sunday, February 20, 2011

People are People

What happenned in Egypt opens many opportunities for the people around the World to cheer about. The most important lesson that I thought was the human face of the Egyptian Army. Already several authoritarian regimes are shivering in their fears and apprehensions about similar outrage and strength of the people's power. It may be debatable about the role of the Army in extending their tacit support (or being sympathetic about) to the people. But, at the end of the day, armies are also nothing but the representatives of the people to protect them and their countries!

The 'demonstration effect' of the Egypt is already seen in the middle East; and many more 'people' may be plannning to emulate the Egyptians! Kudos!

कमी

कमी
उसने हमें फिर ताने दिए
उसी ने तिरस्कार किया
उसी की नज़र में फिर
एक बार गुनहगार हुई
उसके जेहन में जो था, वो
मेरी फितरत में नहीं था
फिर भी उसकी नज़र में
मैं उसकी गुनहगार थी
उसका अपना सवाल था
मेरा कोई ज़वाब न था
वो अपनी तरह सोचता था
मेरी अपनी ही समझ थी
उसको सवालों का हक था
मैं अपने उसूलों में बंधी थी
दोनों ही अपनी जगह ठीक थे
मगर दोनों में ही कमी थी

Saturday, February 19, 2011

सबरंग

रोज़ रोज़ ही रंग बदलती
कुछ नए नए ये ज़िन्दगी
जिसके पीछे भागोगे तुम
वही बस कम देती ज़िन्दगी
हर हाल में समभाव रखोगे
तो नाचती रहेगी ये ज़िन्दगी
हर चीज में सब कुछ ढूंढोगे
तो नाच नचाएगी ज़िन्दगी
कभी कम कभी ज्यादा देती
पर ज़रूर सबरंग है ज़िन्दगी

Friday, February 18, 2011

वापसी

फिर चलती तेज सर्द हवाओं के बीच
तुम्हारे वापस आने की खबर मुझे
एक गर्म मधुर सा एहसास करा गई
मानो कोई कुहासे को चीरती धूप सी
अँधेरे से निकाल प्रकाशमय करती
किसी पर्वत की मनोहर छटा को
बेरंग से नज़रों को रंगीन बनाती
मन में जीवंत उमंगों को जगाती
वातावरण में खुशबू बिखेरती सी
मेरे तन मन दोनों को हर्षाती हुई
जीवन के गीत फिर गाती हुई सी
तुम्हारे वापस आ जाने की खबर!

Thursday, February 17, 2011

देदीप्यमान

रात घुप्प अँधेरी है आज
चाँदनी भी तो नहीं है
ये तो अमावस की रात है
कौन फैला रहा है फिर
ये उजाला मेरे आस पास
कहीं ये मेरा भ्रम तो नहीं
कोई मधुर स्वप्न तो नहीं
लेकिन मैं तो जगा हुआ हूँ
ये मध्यम सी रौशनी मुझे
कौतुहल में डाल रही है
ये संगीत की ध्वनि कैसी
तारों के प्रकाश तो कभी
इतने करीब न देखे थे
कोई मायाजाल तो नहीं?
सोचता हूँ कि ये शायद
मेरे अन्दर का प्रकाश होगा
तो क्या मैं झाँक रहा हूँ
देदीप्यमान होती हुई
अपने ही अन्दर की ऊर्जा?

निश्चय

कभी इन्हीं दो हाथों से उसने
थाम लिया था मेरे हाथों को
मैं निश्चय ही नहीं कर पाया था
उपेक्षा समझी थी वो उस दिन
मैंने इसे अपनी कमजोरी माना
फिर भी महफूज़ रखा दोनों ने
उन यादों और विचित्र भावों को
हमारी समझ तब भी गज़ब थी
आज इतने समय बाद देखे मैंने
उसके काँपते और कमज़ोर हाथ
कुछ भी थामने की ताक़त न थी
समय ने भी उसका हाथ न थामा
पर उसका सब कुछ छीन लिया था
मैं आज भी निश्चय नहीं कर पाया
आज भी वो मुझ पर हँस पड़ी
मैंने फिर कमज़ोर पाया खुद को!

Monday, February 14, 2011

रश्क

इश्क परवान चढ़ा था कभी अपना
इन्तहा में अश्कों का सिलसिला है
मुझे तो रश्क है अपने इन अश्कों पर
ये भी तो मेरी मोहब्बत का सिला है
अपनों ने मेरे भांप लिया तन्हाई को
मुझे तो बस इस बात का गिला है
दर्द के एहसास भी मुझे मुबारक हैं
ये सब कुछ ही यहीं से तो मिला है
जाते जाते इतना ही मैं समझ लूँगा
खुशियाँ मिली और गम भी मिला है
जितना किस्मत में लिखा होगा मेरी
उससे बढ़कर कहीं मुझको मिला है

Sunday, February 13, 2011

परिकल्पना

वो बिसरी सी बातों एवं यादें मेरी
आज भी कभी दिलासा दे जाती हैं
जो मेरी परिकल्पना की उड़ान थे
सच न सही तदपि परछाई तो हैं
वो सब अनूठे जीवन प्रसंग मेरे
जो मेरे जीवन का अभिन्न अंग हैं
गाहे बगाहे सही पर अक्सर ही
मुझे वो मंज़र अब भी बुलाते हैं
कितनी ज़ल्द वक़्त निक़ल गया
वो इस सब का आभास करते हैं
बस छोटी सी इस लम्बी यात्रा में
मेरे हमसफ़र बन साथ निभाते हैं

Saturday, February 12, 2011

Valentine KISS

Love may not need celebrations
Intents don’t require manifestation
Celebrations are good enjoyment
Togetherness too reiterated in all
Why do we need Valentine Day
To remember our loving people
Love can’t be incidental anyways
It is perennial and permanent too
Yet a reminder may be important
‘Cause we have forgotten to live
Life and its facets’ fulfilling ways
Do enjoy and rejoice every year
The celebration of Valentine Day
Remember the buzzword for sure
KISS, Keep It Simple and Short

मूकदर्शक

मेरे समक्ष ही वहां उसे
कुछ लोग छेड़ रहे थे
वो अपने रास्ते चलती
बड़ी बेवस लग रही थी
बार बार आँचल संभाल
मानो अपनी विवशता में
गुहार सी लगा रही थी
पास में खड़े लोगों से
मैं भी उनमें शामिल था
मुझे कर्तव्य बोध का
आभास भी हो रहा था
तथापि न मालूम क्यों
मैं कुछ न कर पाया
मैं बस बदहवास खड़ा
देखता ही रह गया था
मेरी ही तरह सभी लोग
मूकदर्शक ही बने रहे

Thursday, February 10, 2011

सच के पंख

सच की तलाश में चला था मैं
न मालूम ये क्या जुनून था
हारता गया था मैं हर ज़गह
सच का तो कहीं पता न था
सच के नाम हर तरह लोग
अपनी शेखियां बघार रहे थे
न मालूम कैसे कैसे वे लोग
झूठ में सच के पंख लगाते थे
सच का कोई पता नहीं था
झूठ सरे आम हर ओर था
कई प्रकार की चाशनियों में
मिलाकर परोसा जा रहा था
सच की कोई कीमत न थी
झूठ काफी महंगे भाव था
सच कुछ कड़वा ज़रूर था
पर अब भी हर तरफ ज़रूर
उम्मीद का दामन थामे बैठा था

Gone With the Wind

New times have come
The attitudes are new
Body language differs
The ways are different
Most of old shunned
New practices arrived
Unique are treatments
Intents too are different
Overzealous are people
Whatever are the means
Wanting to be billionaires
Everything has price tag
Everyone is marketable
‘It’s everyone’s own life’
Traditions and customs
Family, social bonding
Ethics and value system
Are gone with the wind!

Wednesday, February 9, 2011

Yes face

During Thomas Jeferson’s presidency, he and a group of travellers were crossing a river that had overflowed its banks. Each man crossed on horseback fighting for his life.

A lone traveller watched the group traverse the treacherous river and then asked President Jefferson to take him across. The president agreed without hesitation. The man climbed on, and the two made it safely to the other side of the river where somebody asked him, “Why did you select the President to ask this favour?”

The man was shocked, admitting he had no idea it was the President of the United States who had carried him safely across. “All I know,” he said, “is that on some of your faces was written the answer ‘No’ and some of them was the answer ‘Yes.’ His face was a ‘Yes’ face”.

The most significant decision I make each day is my choice of an attitude. When my attitudes are right there’s no barrier too high, no valley too deep, no dream too extreme and no challenge too great.

Charles Swindoll quoted in “The Himalayan Times”, March 9, 2009

राज

हमारी भी तकरार रही थी
बस कुछ एक बातों पर
उनको कभी ऐतराज था
हमारी हर एक बात पर
हमको भी ऐतराज़ था
बस इसी एक एतराज़ पर
उनको भी इकरार था
सिर्फ उनकी ही बात पर
हमको मगर इकरार था
उनकी हर एक बात पर
हमारी मोहब्बत टिकी रही
बस इसी एक राज पर

Wednesday, February 2, 2011

मुख़्तसर

जब जब भी वो मेरे करीब आये होंगे
हर लम्हा आजमाइशों का रहा होगा
भूल कर ही सही कभी तो हमको
उन्होंने सराहा कभी तो ज़रूर होगा
ये भी एक बड़ी मुख़्तसर सी बात है
हमारे नाम हाथ दामन से छुआ होगा
इश्क न भी हुआ होगा उन्हें हमसे
कोई सदमा तो लगा कभी ज़रूर होगा
मुश्किल तो राह थी नहीं ऐसी कोई'
ये समझने में वक़्त कुछ लगा होगा

Tuesday, February 1, 2011

Moments

I had adored your persona
I revered your sentiments
You too in your own way
Lived all those moments
We thought, behaved alike
Our ways yet were different
We did not agree at times
And offered our comments
Sweat and sour days we had
Major issues had agreements
We laugh at though reasons
On what we had arguments
Running out of the time now
Consolidating our all intents
We should cherish them all
The treasure of all moments

Imbalance

In the race of getting rich
And making a quick buck
In the developing countries
Or the developed ones
Everyone has prospered
But the ‘nations’ didn’t
Nations becoming victims
Of rat race of the people
Their ambitions, aspirations
National and international
Talking about global village
Haven’t looked after here
Even to their own villages
The balance is in imbalance
Humans are now machines
Family bonds, cultures are extinct
Humanity is now an old tale
Some people may often think
Is this what we really wanted?

Easy Option

She looked depressed
Her plain eyes were lost
In past and future worries
Her frail body stumbled
She could hardly walk
Looked around desperately
For help, for any support
She could only get some
Untold sympathy only
From people passed by
Just shrugging shoulders
Thinking about their own
Helplessness to help her
Leaving her to her fate
And her own destiny
Choosing to have for them
The easiest of the options!