Saturday, November 29, 2014

नई फ़िज़ा

नए-नए से ख्वाबों से
महक रही है ज़िन्दगी
ख़ुशी के यूँ एहसास से
चहक रही है ज़िन्दगी
बड़े की चाह में यहाँ
बहक रही है ज़िन्दगी
कुछ और की तलाश में
भटक रही है ज़िन्दगी
नई दिशा और सोच से
पलट रही है ज़िन्दगी
हरएक तरफ हरेक घर
बदल रही है ज़िन्दगी
नई फ़िज़ा नई डगर पे
चल रही है ज़िन्दगी

प्यार फ़लसफ़ा नहीं

कभी-कभी कड़वे घूँट दवा मान पी लेते हैं
प्यार की चाशनी में सब मीठा कर लेते हैं
मर्ज़ को खुद दवा का स्वरुप जान लेते हैं
मर्ज़ का इलाज़ कुछ इस तरह कर लेते हैं
प्यार की तकरार का आभास लिए जीते हैं
बेचैनियों में प्यार की यूँ चैन लिए रहते हैं
मीठे से दर्द का सा एहसास लिए फिरते हैं
हम प्यार से लबरेज़ अन्दाज़ लिए रहते हैं
ज़िन्दगी की अँगड़ाइयों को पहचान लेते हैं
प्यार फ़लसफ़ा नहीं हक़ीक़त मान लेते हैं

Sunday, November 23, 2014

नवचेतन

फिर मिटेगा सघन तम
महकेगा नवचेतन मन
छायेगा उजियारा इतना
फिर से नव प्रभात बन
झोंके बन सुरभित पवन
आयेंगे फिर मेरे आँगन
छोटी सी ये बगिया मेरी
खिल उठेगी ज्यों उपवन
आशायें आकाँक्षा मिलकर
सबरस बरसेंगे मेरे भी मन
अहा सुहाना होगा कितना
दृष्य मनोहर सुन्दर बन


Saturday, November 22, 2014

आदमी कौन !

स्वयं के लिए
भरमाया औरों को
अवश्यमेव

शून्य में था वो
न किसी को खबर
अनजाना था

लोग ले आये
ज़मीन पर उसे
आसमान से

उसके नाम
सब सम्भव हुआ
मेरे खिलाफ़

अब बाशिंदा
ख़ुदा ज़मीन का है
आदमी कौन !


Monday, November 17, 2014

मैं भी प्रतिभागी हूँ

स्वयं पर अन्याय का
पूरा विरोध नहीं करता
चुप रहता हूँ मैं

किसी और पर होता
अन्याय देख कर भी
चुप रहता हूँ मैं

देश की समस्या को
अपनी नहीं समझ कर
चुप रहता हूँ मैं

समाज के अन्यायी लोगों से
प्रायः डर सा जाता हूँ
चुप रहता हूँ मैं

कमज़ोर पर ज़ुल्म देख
कन्नी काट लेता हूँ
चुप रहता हूँ मैं

सारी समस्याओं का
मैं भी प्रतिभागी हूँ क्यों कि
चुप रहता हूँ मैं


बहक जाता हूँ मैं

समझता हूँ
तुम्हारी भी विवशता
लेकिन अपने स्वार्थ से
बहक जाता हूँ मैं

ये कहता हूँ
कल से बदल जाऊँगा
फिर कल की कह कर
बहक जाता हूँ मैं

ये मानता हूँ
लाखों हैं मुझ जैसे
अपने ही घमंड से
बहक जाता हूँ मैं

मैं पहचानता हूँ
तुम्हारे चरित्र को
चिकनी-चुपड़ी बातों से
बहक जाता हूँ मैं

ये जानता हूँ
चार दिन है ज़िन्दगी
इसकी चकाचौंध देख
बहक जाता हूँ मैं

Tuesday, November 11, 2014

ख़ामोश खामोशियाँ

मन के कोलाहल से
बचाने आ जाती हैं
ख़ुद मेरी खामोशियाँ
तुम्हारी नज़र में
रास आती हैं मुझ को
अक्सर खामोशियाँ
खामोश नहीं हूँ मैं
फिर भी मेरे पास
आती हैं खामोशियाँ
तुम कुछ भी कह लो
बड़ी अज़ीज़ मुझ को
ये मेरी खामोशियाँ
ज़माने के शोर में
शोर करने लगती हैं
ख़ामोश खामोशियाँ

Sunday, November 2, 2014

तारा ही भला

सूरज के रहमो करम से
लेकर उधार की रौशनी
जग भर इतराता चाँद

दूर से सही अच्छा लगा
अपनी रौशनी बिखेरता
एक तारा टिमटिमाटा

चाँद अक्सर बीच आकर
सूरज और पृथ्वी दोनों से
अपना हित साधन करता

सूरज भी कुछ कम नहीं
वह भी रौशनी के ऐवज़ में
कितने चक्कर लगवा देता

अपनी सामर्थ्य मुताबिक
जितना हो दे सकने वाला
मुझे तारा ही भला लगता