Thursday, March 19, 2015

दुस्साहस

कर्तव्यनिष्ठा, दया
सहानुभूति और सदाचार
उसे सदा प्रिय थे
उसमें शायद
आत्मविश्वास कम था
बचपन से ही
बड़े होकर
इसका फायदा उठाया
शायद सब ने
उसके परिजन रहे
स्वयं अव्यवस्थित
उनकी चिंता में
अव्यवस्थित रहा
वह भी शायद
उसका ज्ञान असीमित था
पर वो सीमित कहता था
बेमिसाल थी
उसकी विनम्रता
दुस्साहस समझा गया
उसकी ईमानदारी को
फिर भी कमी नहीं रही
उसके प्रशंसकों की
उसका दर्द
सब जानते थे
उसकी व्यथा-कथा
उसे नाखुश रखे रही
और आज, अचानक
असमय जाने की खबर
कुछ को छोड़ सभी को
व्यथित कर गई
उसकीआत्मा हँसती होगी
उपेक्षा पर
साथ न पाकर
जीते जी साथियों का!

Tuesday, March 17, 2015

खैख्वाह नदारद

छोड़ आये थे
वो अपना घर
तलाश में कोई
रोज़गार की
आमदनी इतनी
कि बस गुजर भर
एक आशियाना
सर छुपाने को
बना था किसी तरह
कुछ दे दिला के
वो भी बस
ढहा दिया एक रोज़
देने को कुछ न था
लेने वाले भी
सब्र कहाँ करते
खैख्वाह नदारद थे
अब कौन
चुनाव सिर पर थे!

Saturday, March 14, 2015

हक़दार हैं

कुछ नहीं कहना
सफाई में हमें
उनकी भी अपनी भी
फ़ितरत जानते हैं
हक़ीक़त जानते हैं
इतना मान लेते हैं
बगैर अपराध के
सजा के हक़दार हैं
हम आरोपी हैं
गुनाह क़बूल है
जो भी मिले सजा
भुगत लेने को
हम तैयार हैं

Friday, March 13, 2015

परिहास

हास करता आईना है देख हम पर
झुर्रियाँ यूँ थके चेहरे ज्यों झलकायें
रात-दिन फिक्र में सब एक बन कर
वक़्त खो जाने का एहसास करायें
कर रही परिहास सब अट्टालिकायें
क्या तुम्हारा है ज़रा तुमको दिखायें
बस वही पाँच फुट है वास्ते तुम्हारे
जीते रहो या फिर लोग मर भी जायें
कल से कल की योजनायें ये तुम्हारी
औरों की हैं पर तुम्हारे काम न आयें

उधेड़ बुन

छोटी बड़ी बातें भुला कर
आगे बढ़ जाना भला है
याद रखना हर बात को
अक्सर दर्द बढ़ा देता है
भुला देना व भूल जाना
यूँ तो नहीं होता आसान
लेकिन बमुश्क़िल सही
किया जा सकता है
इसी उधेड़ बुन में लोग
लगे रहते हैं ज़िन्दगी में
कि याद रखना ज़रूरी है
या फिर यहाँ अक्सर
भूल जाना ही बेहतर है
समझ अपनी अपनी !