Friday, May 15, 2020

बाक़ी हैं कहानियां

अब भी बाकी हैं कहानियां इस पार की
बंद घर में हैं पर छोड़ो बात ये बेकार की
ये सिर्फ़ चेतावनी है क्या हो व्यवहार की
दुनिया को क्या सिला बात से उस पार की
ज़लज़ले आए मग़र बात रही बस निशां की
कहर भी बरपा बात पर गुलज़ार ज़िंदग़ी की
हौसले हैं तो रोज़ ही ख़ुशबू वसंत बहार की
कोशिश करी जो वो कहूं न कहूं संसार की
हिम्मत कर ली अग़र क्या फि़क़र मंझधार की
आशियाने हों सुक़ूं के ज़रूरत नहीं व्यापार की
इसी पार मेरा जीवन और घड़ियां प्यार की
कैसे कहूं मैं बात इस पार या उस पार की 

आपदायें

आपदायें तो यहां आती जाती रहती हैं
दीगर बात ये है हम सीख क्या लेते हैं
कुछ आगे बढ़ कर हम भूलने लगते हैं
कि हम अब भी इसी समाज में रहते हैं
श्रम का महत्व भी हम तभी समझते हैं
जब झख़ मार के ख़ुद भी श्रम करते हैं
धनी होते ही हम धन पर दंभ करते हैं
कठिन समय में उपयोग सीमित पाते हैं
स्टेटस की मरीचिका रिश्ते भटकाती हैं
ज़रूरत पर रिश्ते नाते ही काम आते हैं
हम लेना तो जानते हैं देना कम चाहते हैं
ज़रूरतें औरों की अक़्सर कम मानते हैं
हम अपने काम से काम रखना चाहते हैं
औरों की फटी में टांग अड़ाना कम चाहते हैं
हम सिर्फ़ अपनी ही चिंता करना जानते हैं
हमारा भी ख़याल हो ये दूसरों से चाहते हैं
हम अपना व बाल-बच्चों का हक़ मांगते हैं
समाज, देश की चिंता औरों पर छोड़ते हैं
आपदा में भी हम ख़ुद की परवाह करते हैं
नहीं देखते दूसरे क्या हमारी ख़ातिर करते हैं
इस बार आपदा पहले से बड़ी हम मानते हैं
दीगर बात ये कि अब हम सीख क्या लेते हैं 

Sunday, May 10, 2020

मां

सब की तरह मेरी भी मां
सौ जतन कर पालती दुलारती थी
दुख हो सुख हो तकलीफ़ हो
शिक़वे शिक़ायत नहीं करती थी
मां का मन जैसा न भरता
देर रात तक बतियाती धी
बच्चों को आहट  से पहचानती
उनके मन की बात जानती थी
पिता के गुज़र जाने के बाद
मां अकेली किंतु जीवट वाली थी
वयस के साथ सब समझौते करती
मां फिर रुग्ण व कमज़ोर हो गई थी
मां अब सुन नहीं पाती
लेकिन समझ जाती थी
बिना सुने उत्तर देती
लगभग सटीक होता था
मां को बिस्मृति होती
पर पहचान ही जाती थी
वो अब भी दर्द छुपाती
बरबस मुस्कुरा देती थी
मां भजन भी गाती
दुआयें और भी देती थी
अपने सारे ग़म छुपाती
सब ख़ैर बताती रहती थी
मां जो अरमान सजाती
वो हमारी ख़ैर मांगती थी
कृशकाय असहाय सी
पर जीवन-गीत सिखाती थी
बिस्मय हो या कोई परेशानी हो
अब भी बरबस ही पुकार ते हैं
मांsss
मां सब कुछ ठीक कर सकती थी
हर मर्ज़ का एक ही इलाज़ मांsss!
सिर्फ देना ही जानती थी
मांगने में संकोच करती थी
हर हाल में संतोष रखती थी
सब की मां की ही तरह
मुझे हमेशा बच्चा समझती थी मां
अब यूं तो यादें ही शेष हैं
किंतु यहीं आस-पास लगती है मां!