Monday, May 30, 2011

Humble Leadership

Printed from

Puyol, Dhoni and the art of humble leadership
Avijit Ghosh, TNN | May 31, 2011, 01.38am IST
When Barcelona captain Carles Puyol passed on the captain's arm band to defender Eric Abidal so that the latter could lift the Champions Leaguetrophy, it made for one of the most poignant moments on a sports field.

In March, Abidal had undergone surgery for a liver tumour and every football fan understood that Puyol's gesture was as much about bonding as about humility.

In recent times, Indian sports lovers would also recall a similar instance when the captain let his teammate corner the limelight. After India's 2011 World Cup victory, captain MS Dhoni preferred to take the back seat as the team went around the ground with Sachin Tendulkar - for whom it was perhaps the last Cup - on their shoulders.

In each of his triumphs as a captain - winning the T20 World Cup in 2007, the back-to-back IPL wins for Chennai Super Kings - that's been the mark of the man. As always, Dhoni preferred the soft glow of the penumbra, not the glare of the spotlight.

For those familiar with business management theories, the act of shunning the spotlight by Puyol and Dhoni are perfect examples of the "humble" leadership approach. What was occasionally happening in corporate boardrooms is now taking place on the football and cricket pitches - for all to behold. They are perhaps the new management case studies.

One of the theory's foremost proponents is management consultant Jim Collins, author of two much-quoted works, "How the Mighty Fall" (2009) and "Good to Great" (2001). "The key ingredient that allows a company to become great is having a Level 5 leader: an executive in whom genuine personal humility blends with intense professional will," he wrote in Harvard Business Review.

The "humble leaders" are a sharp counterpoint to the Lee Iacocca and Jack Welsh school of leadership. For the former, the "I" is secondary to the "we" or "us". Social scientist Shiv Viswanathan calls it "a collective understanding of creativity." He says that such leadership style recognizes and appreciates "the smaller actors in a victory" who contribute in minor but meaningful ways in a major team triumph.

But it isn't easy being a Dhoni or a Puyol. Adman and social commentator Santosh Desai believes that such acts require supreme self-confidence and wisdom. "Such gestures of humility also build your longevity as a leader. You get more latitude during bad times," he says.

Which is why authors and thought leaders Jack Zenger and Joe Folkman advise in "The Handbook for Leaders", "Don't flaunt your authority. Humility will make you approachable. It opens the door to building relationships."

In his well-researched work, Jim Collins also details the case of Darwin E Smith, who metamorphosed Kimberly-Clark into a leading paper products company in the 1970s and 80s. Reticent and unassuming, Smith is said to have avoided attention. He grew up on a farm, went to night school at Indiana University and also worked in the daytime.

One day he lost a finger at work. "The story goes that he went to class that evening and returned to work the very next day. Eventually, this poor but determined Indiana farm boy earned admission to Harvard Law School... Smith is a classic example of a Level 5 leader, an individual who blends extreme personal humility with intense professional will," writes Collins.

The "humble" leader, in other words, need not be mistaken for a malleable personality. For instance, even when India's cricket crazy public wanted R Ashwin as the team's second spinner during the World Cup, Dhoni disagreed. Aswin did well in the limited opportunities that he got, but Dhoni plumped for Ashish Nehra in the semifinal and S Sreesanth in the final. And won. A "humble" leader is also his own man.


मंदिरों की कर्णप्रिय घंटियाँ
शंख्ध्वनि का अतुलनीय संगीत
प्रातः काल रमणीक पहाड़ों में
धर्म-कर्म में लीन पर्वतीय जन
मनोरम छटाओं के बीच जीते
अपना नित्य संघर्षमय जीवन
कर्मठ महिलाएं और बच्चे
पुरुष प्रधान समाज में जीते
परिवार का उत्तरदायित्व निभाते
हर कठिनाई से जूझते भी
लगभग प्रसन्न ही रहते
श्रम, विश्वास और आस्था ही
जीवन्तता के परिचायक हैं
और इनके जीवन का आधार

अँधेरे ही बेहतर

एकान्त सपनों की दुनियां में
जाने क्या-क्या ख्वाब बुनते हैं
उदास आँखों में भी हम अपनी
ख़ुशी की चमक सी देख लेते हैं
बस तुम्हारे सानिध्य के लिए
हम यहाँ हर रोज तरसते हैं
तुम अक्सर पास नहीं होते
फिर भी हम इंतजार करते हैं
ख्यालों में ही सही अँधेरे में
हम तुमारी छबि तो देख लेते हैं
इसीलिए उजाले की जगह पर
हमें अँधेरे ही बेहतर लगते हैं

Sunday, May 29, 2011

Am I dead?

I cried and laughed too
With you in my moments
Of joy and in sorrows
I cared for you always
Was busy make happy
Each single one of you
You all busy with self
As if I don’t exist now
Stopped thinking of me
Why is it so strange?
None looking after me
Questions unresponded
I don’t need to eat now
I don’t even feel thirsty
No feeling of pain too
Question but no emotion
I question my existence
Can this be the truth?
But I don’t yet believe it
That I’m already dead!


I did admire him and his ways secretly
His sixth sense could smell the secret
He had wanted to go steady with me
I ignored and reprimanded him too
When I wanted to know him better
Hesitation had surrounded thoughts
I overcame the hesitation somehow
But someone else started adoring him
I was then ready for a new beginning
With the conviction of mind and soul
Alas! Opportunities never came back
I concluded, life was that way for me


Some problems arrive suddenly
They appear like the whirlwinds
They come with such intensity
Leave little to plan to deal with
That’s the time for quick action
Taking the appropriate decision
Without impulse but reasoning
Taking the clear calculated risks
Assuming the havocs it can play
If it’s not efficiently dealt with
Presuming the decisions work
Taking away the problems too
Along with the very whirlwind


समय गुज़रता रहा; मंजिल अब भी पास नहीं
दूर से ही क्या निहारें; करीब तो जाना ही होगा
ठान ही ली जो अब; हिम्मत से भी काम लेंगे
रास्ते आसान तो नहीं; सफ़र तय करना होगा
कदम बढ़ चलेंगे तो, हमसफ़र भी मिल जायेंगे
मुश्किलें आयेंगी ज़रूर; सामना करना ही होगा
कोई साथ न दे न सही; अकेले ही बढ़ जायेंगे
दिल में ये ख़याल उठे; जोख़िम भी उठाना होगा
हमने दिल से कहा, ये भी मगर अब है ज़रूरी
दिल नहीं मानता, पर इसे भी समझाना होगा

Saturday, May 28, 2011


कितनी शिद्दत से संभाला मैंने
फिर भी वो दूर हो गया मुझसे
नजर के सामने तो वो ज़रूर था
और था मेरे दिल के करीब भी
फिर भी ज़िन्दगी उदास सी थी
आँखों में एक अजीब प्यास थी
हाँ! कुछ संजीदा मैं ज़रूर थी
हौसला नहीं खोया था तब भी
झाँका था जो उस रोज़ मैंने
चश्म-ए-पुरनम के कोने से भी
मेरा आफताब वहीँ था मौजूद
वहीँ पर था मेरा आसमान भी

सब्र से कद्र

कद्र तुमने बहुत की लेकिन
कद्र करना तुम्हें नहीं आया
मेरे ज़ज्बातों की कद्र तो की
ज़ज्बात निभाना नहीं आया
हमने कोई शिकायत न की
बासब्र सब शिकवे सुनते रहे
हर बार हर शिकायत में पर
तुम्हें सब्र के पास नहीं पाया
आलम मगर नागवार हमको
खुद की कद्र करते नहीं पाया
चन्द अल्फाज़ क्या बताएँगे
सब्र से कद्र कौन कर पाया

Friday, May 27, 2011


हाँ तुम्हारी ही भाँति मुझे भी
प्रायः स्मृति में मिल जाते हैं
वो विगत के पल और स्थान
मेरे जीवन के अभिन्न अंग
जीविकोपार्जन तो माध्यम था
मेरी नियति में सब नियत था
देखो तुम्हें भी सब स्मरण है
ठीक तुम्हारी ही तरह मैं भी
बस अनचाहे ही सहता रहता हूँ
विवशताएँ स्थान-परिवर्तन की
बस घुमन्तू पक्षियों की तरह
बदलते 'मौसम' के साथ-साथ

Thursday, May 26, 2011

In Tandem

When I look back in times
Life was indeed fair to me
At times, I wasn’t happy
My confidence was shaken
Friends, people didn’t help
I was yet patient though
I had withstood adversities
Also did not lose any hopes
Times has passed by slowly
Things started looking up
New opportunities came
Life was again smiling at me
Confidence was redoubled
Everything was under control
Testing times keep coming
Also solutions and comforts
They actually move in tandem

Wednesday, May 25, 2011

डायबिटीज और मरीज (courtesy Shanno Agrawal)

डायबिटीज एक बहुत ही गंभीर बीमारी है जिसे एक बार हो जाने से इंसान को जिंदगी भर भुगतना पड़ता है. जब किसी को जांच करवाने पर पहली बार पता लगता है तो उस इंसान के व उसके परिवार के कदमों के नीचे से जैसे जमीन निकल जाती है. अब एक रिसर्च के मुताबिक सबके दिलों को हिला देने वाली खबर है कि हर तीन मिनट में एक इंसान डायबिटीज का शिकार होते हुये पाया जा रहा है. यहाँ इंग्लैंड में 3% लोग डायबेटिक हैं...और उनका नंबर बराबर बढ़ता ही जा रहा है. जिनमे अब युवा लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. और 2025 तक पूरे विश्व में डायबेटिक लोगों की संख्या दुगनी होने की सम्भावना की जा रही है.

डायबिटीज क्या है ?

डायबिटीज के लक्षण होते हैं हाई ब्लड सुगर लेवल या फिर लो ब्लड सुगर लेवल. और अगर डायबेटिक लोग लापरवाही बरतते हैं यानि अपने खान-पान में संतुलन नहीं रखते हैं तो इस असंतुलित ब्लड सुगर लेवल से उन्हें आँखों, किडनी, दिल, टांगों, पैरों और रक्तसंचार में बहुत समस्यायें पैदा हो सकती है.

शरीर का अग्न्याशय (Pancreas) अंतःस्राव (Harmone) को जिसे हम इंसुलिन कहते हैं उसे पैदा करता है. और इस इंसुलिन की सहायता से ग्लूकोस हमारे रक्तप्रवाह में पहुँचता है जिससे शरीर को ऊर्जा ( Energy) मिलती है. इंसुलिन की कमी व इसके ना होने से ग्लूकोस रक्तचाप में न पहुँचकर शरीर में इकठ्ठा हो जाता है और यूरिन में निकल जाता है. डायबिटीज का संबंध मोटापा व जननिक (Genetic) से भी है. या जो लोग मीठी चीज़ें अत्यधिक खाते हैं या शराब आदि बहुत पीते हैं उनको भी डायबेटिक होने के अधिक चांस रहते हैं. डाक्टर से इस बीमारी की पुष्टि होने के पहले इस बीमारी के आसार ये होते हैं:

1.प्यास का बहुत लगना.

2.अत्यधिक थकान.

3.दृष्टि में धुंधलापन.

4.बार-बार पेशाब जाना.

5.एकदम से तमाम वजन कम हो जाना.

6.घाव व जख्मों का जल्दी न भरना आदि.

जैसा कि अब अधिकाँश लोग जानते हैं डायबिटीज दो तरह की होती है:

A. टाइप 1 डायबिटीज: ये या तो जननिक (Genetic) होती है या अग्नाशय में शरीर के इम्यून सिस्टम या कहिये विषाणु (some Virus) से इंसुलिन पैदा करने वाले कोष की क्षति से इंसुलिन बिलकुल पैदा नहीं हो पाता. और इन मरीजों को हमेशा इंसुलिन के इंजेक्शन लगाने की जरूरत होती है. इसका अब तक और कोई इलाज नहीं है. कितनी बार, कब और शरीर के किस हिस्से में हर दिन इंजेक्शन लेना है ये डाक्टर ही बताता है.

B. टाइप 2 डायबिटीज: डायबेटिक लोगों में से 90% डायबेटिक टाइप 2 के होते हैं जिनके शरीर में बहुत कम इंसुलिन बनती है या फिर शरीर उसका इस्तेमाल ढंग से नहीं कर पाता है.

डाक्टर और नर्स जैसे अनुभवी लोगों का सहारा होते हुये भी इंसान को हर दिन खुद ही अपनी बीमारी का सामना करना पड़ता है. इसलिये उसके बारे में क्या करना है उसे खुद समझदारी से काम लेना चाहिये. डायबिटीज का प्रबंधन यानि अनुशासन (Management) स्वयं करना सीखना चाहिये. सेहत के लिये व्यायाम करना, टहलना, तैरना अच्छा है. अपना वजन कम करना चाहिये व और कामों में भी सक्रिय रहना चाहिये. डायबेटिक के लिये मीठी व तली चीजों को खाने की बिलकुल मनाही नहीं होती है. बल्कि उन्हें बहुत कम खायें और भी खाने की अन्य चीजों में संतुलन रखें. घी का इस्तेमाल न करके ओलिव आयल या रिफाइंड आयल का उपयोग करें लेकिन बहुत कम. खाना सही समय पर खायें व ताजे फल और सब्जियों का अधिक प्रयोग करें.

नियमित रूप से डाक्टर को दिखाना, ब्लड सुगर लेवल, कोलेस्ट्रल लेवल, और आँखों की जाँच करवाना बहुत ही जरूरी होता है ताकि कोई समस्या बढ़ने के पहले उसका सही उपचार किया जा सके.

Tuesday, May 24, 2011


कुछ राज जो संजोये थे तुमने
दफन कर तुम्हारे ही सीने में
आज भी वो महसूस करते हैं
तुम्हारे गाढ़े हुए वो ज़ज्बात
तुम्हें तो ये भी एहसास नहीं
तुम आज भी उन्हें संजोये हो
लोगों का क्या वो इधर-उधर
संयोग और नियति के बंधन
जीवन प्रसंग के पल भर हैं
बस ज़ज्बात तुम्हारे ही अपने
हों क्यों न दफ़न सीने में हैं

Monday, May 23, 2011


न मालूम सब क्यों उलट था
मेरी अपेक्षाओं के प्रतिरूप
ज़िन्दगी परीक्षा ले रही थी
चाँदनी तब मुझे चुभने लगी
चाँद कुछ उष्ण लगने लगा था
भला हो बादलों का जिन्होंने
चाँद और चाँदनी दोनों को ही
दोनों का मार्ग अवरुद्ध कर
अपने भीतर छुपा लिया था
बनती बिगड़ती आकृतियों को
अँधेरे ने छुपा ही लिया था
फिर कल सुबह पौ फटते ही
सूर्योदय की प्रतीक्षा में मुझे
सवेरा भी दृष्टिगोचर होने लगा


अधरों में प्यास लिए
मैं प्यासा ही बैठा था
अधरों में शब्द दबाये
मैं कुंठा में बैठा था
अधरों की व्याकुलता को
मैं तो समझ रहा था
किन्तु अधरों का संकोच
कुछ करने नहीं देता था
खामोश अधर के कम्पन में
शब्द प्रस्फुटित होना चाहते थे
अधरों का अधरों में मानो
मूक रहने का निर्णय था
अधरों के इस मूकपन से
मेरा संसार बदल गया था


Every time I tried to stay away
I could never succeed that way
I wrote to myself unwritten words
I spoke to me but outspokenly
My unspoken words still stayed
I tried shutting the memory lane
Avoided even mentioning of you
I tried to convey the way I felt
Was short of words and letters
I wanted to explain the unspoken
My conscience deemed it crime
Mind didn’t agree with emotions
Yet kept away from door of words
I was being criminal to myself
Wanted to follow path of ideal; but
Howsoever hard tried to stay away
My recidivism came on the way

Sunday, May 22, 2011

अनुभूति by: सुमित्रानंदन पंत

तुम आती हो,
नव अंगों का
शाश्वत मधु-विभव लुटाती हो।

बजते नि:स्वर नूपुर छम-छम,
सांसों में थमता स्पंदन-क्रम,
तुम आती हो,
अंतस्थल में
शोभा ज्वाला लिपटाती हो।

अपलक रह जाते मनोनयन
कह पाते मर्म-कथा न वचन,
तुम आती हो,
तंद्रिल मन में
स्वप्नों के मुकुल खिलाती हो।

अभिमान अश्रु बनता झर-झर,
अवसाद मुखर रस का निर्झर,
तुम आती हो,
प्राणों में ज्वार उठाती हो।

स्वर्णिम प्रकाश में गलता तम,
स्वर्गिक प्रतीति में ढलता श्रम
तुम आती हो,
जीवन-पथ पर
सौंदर्य-रहस बरसाती हो।

जगता छाया-वन में मर्मर,
कंप उठती रुध्द स्पृहा थर-थर,
तुम आती हो,
उर तंत्री में
स्वर मधुर व्यथा भर जाती हो


आहिस्ता-आहिस्ता होने लगे
वो मुझसे कुछ दूर-दूर इधर
ठीक उसी तरह ज्यों हुए थे
करीब मेरे चन्द बरस पहले
तब और अब में आ गया
फर्क ज़माने भर का मानो
और हमारे ज़ज्बातों में भी
कुछ-कुछ अपनी ही वजह से
काफी कुछ गैरों की वजह से
हमारे मोहब्बत के हसीं पल
तुनक मिजाजी के सर हो गए
हमारी ही खुद की ज़िन्दगी में
कोई और अब घर कर गए

पंचवटी -मैथिलीशरण गुप्त

चारु चंद्र की चंचल किरणें,

खेल रहीं थीं जल थल में।

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी,

अवनि और अम्बर तल में।

पुलक प्रकट करती थी धरती,

हरित तृणों की नोकों से।

मानो झूम रहे हों तरु भी,

मन्द पवन के झोंकों से।

पंचवटी की छाया में है,

सुन्दर पर्ण कुटीर बना।

जिसके बाहर स्वच्छ शिला पर,

धीर वीर निर्भीक मना।

जाग रहा है कौन धनुर्धर,

जब कि भुवन भर सोता है।

भोगी अनुगामी योगी सा,

बना दृष्टिगत होता है।

बना हुआ है प्रहरी जिसका,

उस कुटिया में क्या धन है।

जिसकी सेवा में रत इसका,

तन है, मन है, जीवन है।

Saturday, May 21, 2011

In Love

When my eyelids are down
You are there just before me
When I am deep asleep too
Through the dreams you enter
When I an awake and kicking
You are there in imagination
When I want to keep off you
My attention is still in there
If I had ever tried to forget you
I am yet more focused on you
I have overbearing emotions
Whenever you are involved
I don’t know what you feel
I seem to be in love with you!

Friday, May 20, 2011


I revered life and all its gifts
Life gave me the testing time
I wanted to grow up faster
But time flew faster than me
Wanted many friends around
Ended amidst lot of enemies
I wanted a few drops of joy
Got the ocean of problems
I wanted to live my dreams
But lost my daily sleep time
I wanted with me some people
They all left me one by one
I wanted support of my family
They had their own dreams
I compromised with this all
Life sounded beautiful to me

Thursday, May 19, 2011


तुम तो अपनी कह लिए
मेरी बारी अभी बाकी है
यों पलट के न चल दो
अभी बात कोई बाकी है
कुछ और इंतजार करो
अभी सवाल कई बाकी हैं
बात भर कह देने से क्या
अभी तो इम्तहान बाकी है
सुबह की रौशनी अब कहाँ
अभी भी कुछ रात बाकी है
शिकवे शिकायत तो हो गए
अभी ज़ज्बात कोई बाकी है


बस एक फीकी सी हंसी
उसके चेहरे पर मौजूद थी
जो जर्जर हो चला था
वक़्त से काफी पहले ही
उसकी मुस्कराहट में भी
नैराश्य भाव ज्यादा था
उसके कांपते और सूखे होंठ
एक सवालिया हकीकत से
उसकी बदहाली बयाँ करते
उसे किसी से अपेक्षा न थी
वो ज़िन्दगी से हार चुकी थी
उसे मालूम था वो अकेली नहीं
इसके ज़िम्मेदार कई लोग थे
उसके मन में आज भी शायद
इसीलिए कड़वाहट भरी थी

Tuesday, May 17, 2011


मैं और मेरे सारे ज़ज्बात तब
कैसी मायूसी में पिघल रहे थे
मेरी हसरतें दरकिनार कर जब
तुम बड़ी आसानी से चल दिए थे
उन सब नायाब लम्हों को जब
तुम्हारे साथ समेटना चाहता था
मैं अपने आप में ही बस सिर्फ
खामोश सिमट कर रह गया था
तब तुम जान बूझकर ही मुझे
मेरे सहारे गुजर को छोड़ गए थे
मैं टूटा कतई नहीं था और फिर
मैंने अपना ही भरोसा कर लिया
महज इत्तेफाक़न ही सही तुमने
मुझसे मेरा तवारुख करा दिया

Monday, May 16, 2011


प्रीत की रीत में ऐसी उलझी
भूल चली थी मैं खुद को
जो भी ख्वाब दिखे प्रीत में
पाया भी न खोया उनको
जिसकी प्रीत में था सब खोया
पाया भी न उतना उनको
अपनी राह के थे सब राही
कोई साथ मिला न मुझको
एकाकी सा था मन ये मेरा
कोई राह न सूझी थी मुझको
खुद से करने प्रीत जो निकली
सब कुछ मिल गया मुझको

हो न हो

क्या मालूम आज फिर अचानक
कोई ख़्वाब सुनहरा शायद आए
और मेरी दिन भर की परेशानी
खुशगवार लम्हों में बदल जाए
मैं बेताबी से ही इंतजार करूँगा
क्या जाने किस घड़ी आ जाए
नींद का आना भी अब ज़रूरी है
कहीं रात पलकों में न कट जाए
ख़्वाब जाने किस वक़्त आएगा
शायद पलक झपकते आ जाए
न आया तो भी इंतजार रहेगा
आज हो न हो कल आ जाए

Sunday, May 15, 2011


Sounds of your footsteps
Still make me conscious of
Your presence around me
Through the memory lane
You are not around me now
But I can visualize presence
Yes your natural smile too
Makes my day visualizing
The moments and days old
The uninhibited emotions
Arguments and retracting
Returning to the harmony
And reminiscences many
The togetherness far now
But visualization is around


बस नहीं है ये सिर्फ इत्तेफाक
जिसे मैं अक्सर भुलाता रहा था
उनके स्वार्थ हेतु साधन बन
अपनी नज़रंदाज़ी भूलता रहा था
मुझे अब एहसास होने लगा है
वो जान बूझकर ये कर रहे थे
मेरा व मेरी भावनाओं का प्रायः
उनके द्वारा किया गया इस्तेमाल
मेरी सदाशयता वश उदार सा था
मैं अब भी, न चाहते हुए भी
उदार बना रहूँगा भविष्य में भी
शायद मेरी प्रवृत्ति जान बूझकर
अपना कर्त्तव्य कर ही देने की है

Friday, May 13, 2011


हाँ देखो अलबेला ही हूँ मैं
किसी राह से चाह न मुझको
मैं अपनी ही राह बनाता हूँ
कौन बना पायेगा अपना सा
मैं बस एक स्वयं सा बनता हूँ
सफ़र सभी सा मेरा भी पर
डगर नई मैं चुनता हूँ
दुनियां की रस्मों से हटकर
मैं नई रस्म पर चलता हूँ
मेरे तो साथी सारा जग हैं
नहीं सिर्फ कुछ चुनता हूँ
हर दिन प्रतिपल मैं भी लेकिन
स्वप्न नए नित बुनता हूँ
अलग नहीं कुछ तुम सा ही मैं
लेकिन हाँ अलबेला हूँ मैं

Wednesday, May 11, 2011

आज भी

तुम्हारे स्पर्श के स्पंदन का
आज भी होता है रोमांच सा
आभास सा भी होने लगता है
मानो कोई आज भी चाहता है
मेरे ही आस पास रहकर उन
नजदीकियों का अहसास करना
अब भी उस पल की स्मृति में
मैं बार-बार खो जाना चाहती हूँ
जो मेरे जीवन की मिठास सी
मेरे पहले प्यार की आस सी
ताज़ा है मेरे मन भी आज भी

Monday, May 9, 2011


I can not but decisively say
What is it the most important
Who can be indispensable
What is being responsible
Why anything I should say
Find about all these answers
Imperfect they are anyway
Yet I would sure like to say
Time, space, circumstances
Prevail over our own thinking
Logical and at times illogical
Our opinions too have a bias
Emotions are blur and erratic
Actions are sometime neurotic
So many influencing factors
Without compromising on core
It’s best to swim with times!

अपनी ही

हमें तो ज़रा भी इल्म न था
हमदम तेरी रहनुमाई का
बस फक्र करते रहे थे हम
हर पल मिली रुसवाई का
बेचैन परेशान तो थे मगर
भरोसा था हमें खुदाई का
हर पल काटे सब्र से पर
आलम फ़क़त जुदाई का
दावा तो न किया पर कभी
ज़िक्र न किया जगहँसाई का
ज़िन्दगी अपनी ही तो थी
कुछ भी नहीं था पराई का

मेरा नया बचपन by सुभद्रा कुमारी चौहान:):)

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी भी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

- सुभद्रा कुमारी चौहान

Sunday, May 8, 2011

प्रिय पुत्र

दिन के सूरज से चमको तुम
शीतलता किन्तु चांदनी की हो
रोमांचित तन मन सब हो जाए
यश और कीर्ति तुम्हारी ऐसी हो
स्वयं प्रशस्त रहो सदा तुम
चहुँ ओर साथ प्रशस्त जग हो
रहे सदा तुम्हारा आचरण सरल
किन्तु कभी मन-मैल न हो
जीवन पथ पर सुख शांति सदा
प्रिय पुत्र! सदा तेरी जय हो!


Whenever I was in trouble
I remembered my mother
Whenever she is in trouble
She tried to keep it to self
When I was unwell or sick
She was always by my side
If she wasn’t in good health
She tried to hide from me
For my needs expressed
She would go out of way
For her own urgent needs
She would never express
Mothers’ love is selfless
Others have expectation
Why can’t we all can be
Like the mothers we know!
Happy Mothers’ Day

Friday, May 6, 2011


Many times I did notice many kids
Struggling for clothing and bread
Noticed men and women so many
Suppressed by respective spouses
Living with sorts of emotional stress
Yet are trying to live harmoniously
Many poor people dreaming about
Being rich watching others that way
Ambitions of some affluent people
Social, economic, domestic, political
Most people being mere mute victims
Of others people’s ambitions, attitude
Taking the others for a ride for sure
And the endless more such examples
People endlessly awaiting fortunes
And yet compromising with present
Perhaps, that’s how the life treats!