Friday, May 31, 2013

टकराव / Clash

उनके व मेरे बीच का टकराव सिर्फ इस बात पर है
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा झलकता किस पार इधर है
ये रिश्तों का सिलसिला अब इस बात पर निर्भर है
मानो ज़िन्दगी हँसने व मुस्कुराने का ही फर्क भर है
The clash of thought between us depends on
Which way does the philosophy of life tilts on
The path of this relationship thus depends on
Indifference of smile and laughter life lies on

अंदाज़-ओ-ढंग / methods and ways

चन्द अल्फ़ाज़ ही नहीं ये ज़ज्बात थे हमारे
कह नहीं पाए क्या करें ऐसे हालात थे हमारे
ये भी था सोचा शायद वो समझ ही गए होंगे
बस ऐसे अलग अलग अंदाज़-ओ-ढंग हमारे
Not just few words they were my sentiments
Alas! couldn't speak so were circumstances
I also believe that the message went across
Thus how different are our methods and ways

Thursday, May 30, 2013

बहाना /Pretension


जिनके खुद के ही ईमान बिक चुके होते हैं
उन्हें सारा ज़माना बेईमान नज़र आता है
हर किसी के बेईमान होने की बात कहकर
ख़ुद की बेईमानी का बहाना नज़र आता है
Those who have sold off their integrity
They find the entire World as corrupt
Talking about everyone's lost integrity
They find pretensions of being corrupt

Tuesday, May 28, 2013

Time

वक़्त की ये नज़ाकत तो देखिए
हर बार चकमा दे जाता है मुझे
कभी अपने बीते की कभी दूर की
सोच दिखा झाँसा दे जाता है मुझे
See the nuances of the time
Each time it gives a slip to me
Takes me to it's past or future
A walk through a mirage to me

Monday, May 27, 2013

ताउम्र / All Life

वक़्त के साथ सब कुछ हमेशा बदले ये ज़रूरी नहीं
कुछ बातें कुछ वादे कुछ लोग अक़्सर एक से रहते हैं
आसमान से तारे तोड़ लाने की बात अब हुई पुरानी
हम तो बस ताउम्र तुम्हारा साथ निभाने की कहते हैं
It's not necessary that everything changes with times
Some people and few things may often remain permanent
'Plucking the stars from skies' is a proverb now bygone
I for one say only about being by your side all our lives

Sunday, May 26, 2013

बंदूक़

इतिहास गवाह है
कोई हल नहीं निकलते
बंदूक़ की गोली से
फिर भी चन्द लोग इसे
मानकर भी नहीं मानते
ख़ुद के साथ साथ
मासूम निर्दोष जन को
इस आग में झोंक देते
अपनी ज़िद के चलते
लेकिन हर आतंकवाद
किसी वज़ह में पलते
कहीं न कहीं ये सदैव
व्यवस्थाजन्य कारणों से
शोषण व अभाव में पलते
उभय पक्ष की ग़लतियों का
खामियाज़ा मासूम भुगतते

Saturday, May 25, 2013

बड़प्पन / Large-heartedness

क़ैसे तुम सब कुछ भुला कर मुस्कुरा सकते हो
मैं जाने कितने बोझ ज़ेहन में बसाये ज़िन्दा हूँ
उस रोज़ मैंने तुम्हें हर बात को खूब कोसा था
आज तुम्हारा बड़प्पन देख खुद से शर्मिंदा हूँ
How can you forget about everything and keep smiling
I for one live with so many grievances in my mind stored
I remember that day I had cursed you about everything
Today looking at your large-heartedness I am so ashamed

Thursday, May 23, 2013

मन की / From Mind

किस किस बात की दें हम सफाई तुम को
तुमने कह दी हम फिर कभी कहेंगे मन की
कभी जब होगी फुर्सत सुनने की तुम को
तभी कह देंगे हम भी बात अपने दिल की
For what all things do I need to explain to you
You have said I will tell you my mind another day
Sometime when you have time to listen to my side
I should tell you the feelings of my heart that day

Reside

तुम को बसा के रखा हमने इस तरह इन आँखों में
नींद में जब पलकें बंद हों तो ख्वाबों में बस जाते हो
आँखें खुलीं तो महक उठती है उसी पल तुम्हारी याद
इस तरह याद आते हो यूँ हर पल मन में बस जाते हो
I have held you around like this in these eyes
When eyelids drop in sleep you enter my dreams
I do visualize immediately with opening of eyes
Remember you so much that in my mind you reside

खोट

वतन से अब खुदी का टकराव है
कुछ ऐसा ही महसूस होने लगा है
पहले खुद से वतन पहले आता था
पर वतन अब महज़ एक पता है
यहाँ खुद से बेहतर कुछ भी नहीं है
लोगों को शायद ऐसा लगने लगा है
खुद से क़ौम, क़ौम से वतन पहले
ये सब दकियानूसी लगने लगा है
हर कोई रातों रात अमीरी ढूंढता है
मुल्क़ बेच भी खुद दौलत चाहता है
लोगों की सोच में खोट आ गया है
ऐसा ही मुझे महसूस होने लगा है

Wednesday, May 22, 2013

आहट

बड़ी ही कोफ़्त होती थी
आस पास की आहटों से
प्रत्यक्ष व नेपथ्य से आती
आवाज़ें अनचाही सी थीं
किन्तु अब मानो शून्य है
कितनी गहन ख़ामोशी है
खामोशियों के स्वरों को
कोलाहल की तलाश है
मौन के ये पल अब यहाँ
कुछ डरावने से लगते हैं
अब किसी भी आहट का
मुझको इधर इन्तज़ार है

Tuesday, May 21, 2013

आब-ए -हयात

किसी रोज़ सोचा था ज़िन्दगी से भी होगी मुलाक़ात
मुलाक़ात तो होती रही लेकिन न हो पाई कभी बात
इसी तरह मुन्तज़िर से भटकते रहे हमारे ज़ज्बात
जाने अनजाने अब बस यूँ ही निक़ल गई थी मियाद
कभी हम न समझ पाए कभी ऐसे ही रह गए हालात
अब सोचते हैं ज़िन्दगी हर रंग में देती है कुछ सौगात
किसको क्या मिला यहाँ क्या नहीं खास नहीं ये बात
कौन समझ पाया इसको उसी ने चखा आब-ए-हयात

Monday, May 20, 2013

Enchanted

तुमसे अलग होकर जेहन में कुछ उदासी थी
तुम्हें मुस्कुराते देखा तो ये मन खिल उठा था
वो सारे लम्हे एक एक कर याद दिला रहे थे
तुम मुस्कुराते रहो यही मैंने हमेशा चाहा था
Away from you my mind had some sadness
Seeing you in smiles my heart was enchanted
All those moments reminding me one by one
You keep smiling this all I had always wanted

आत्मसंतुष्टि

अथक प्रयासों के बाद भी
मेरे अकथ प्रेम का स्वरूप
मेरी दृष्टि में ही मान लिया
सदैव एकदम पृथक सब से
अगाध और प्रगाढ़ है, किन्तु
इसमें कुछ सार्थक न पा सके
फिर भी मैं संतुष्ट हूँ क्यों कि
तुम्हारी दृष्टि में निरर्थक नहीं
उत्प्रेरक या प्रेरक रूप में भी
मेरा होना या पहचाना जाना
यदा कदा क्षण भर को सही
मेरे लिए ये पर्याप्त कारण है
मेरी आत्मसंतुष्टि के लिए

Sunday, May 19, 2013

Distances

ये भी एक समझने समझाने की ही बात है
कभी दिलों की दूरियाँ मिटा देते हैं फ़ासले
मालूम अगर हो जाए ये वज़ह फ़ासलों की
फ़ासलों से अक़्सर मिट से जाते हैं फ़ासले
This too is matter of understanding in context
At times distances remove distances of hearts
If you find the reasons of distances that erupt
Distances would often remove the distances kept

Saturday, May 18, 2013

हमारा-तुम्हारा/ Mine-Yours

मन की हर बात है हमारा तुम्हारा रिश्ता
सिर्फ़ दिल ही क्या ये तन-मन का रिश्ता
साँसों से धड़कन का ज्यों होता है रिश्ता
इससे ज़्यादा और कुछ कह नहीं सकता
Every thing in mind is based on our relation
Not mere heart it's a body and mind relation
Like breath and heart-beat have the relation
To say anything more on this is really in vain

Friday, May 17, 2013

फितरत / Nature

जो भी मोहब्बत से मिला वो मेरा अज़ीज़
जो रूखे मन से मिला वो भी मेरा अज़ीज़
मुझे तो बस अपनी ही फितरत है अज़ीज़
नहीं जानना चाहता औरों को क्या अज़ीज़
Ones who met me with affection are dear to me
Ones met with cold shoulders are also dear to me
I would always like to retain my own very nature
I don't want to know what all is dear to the others

कुछ नहीं / Nothing

किसी और के भरोसे बैठ कुछ नहीं होगा
बस अपनी किस्मत अपने आप लो जगा
कुछ हासिल नहीं इंसानों से उम्मीद लगा
ज़िन्दगी जब वफ़ा करके दे जाती है दगा
Nothing shall be achieved depending on the others
Just workout to carve out yourself your own destiny
Nothing will ever arrive by expectations from others
When the life itself deserts us after all it’s faithfulness

Tuesday, May 14, 2013

सियासी भूल / Political follies

सियासी भूलों की सजा तो पा रही है अवाम
सियासती गुनाहों की सजा पा रहा है मुल्क़
फिर से उड़ने लगी हैं सियासी चुनावी पतंग
मंज़र वही है और वही है आगाज़ की झलक
People are being punished around for the political follies
Nations are being made to suffer for the political crimes
Once again the political kites are flying for the elections
The scenario is the same and the famiilar is the kick-start

नेपथ्य

एकालाप से करते हुए ये प्रबुद्ध जन
अपने ही प्रयोजन सिद्धि के निमित्त
जन एवं मानस दोनों को बिसराते
जन-मानस के ये तथाकथित सेवक
चुनाव प्रचार के हथकंडों में संलग्न
अपनी ही शोभायात्रा के दर्प में लिप्त
अपने अपने संघर्ष में सब हो व्यस्त
जन को भी जन की व्यथा बिस्म्रित
अब एकाकी युद्ध सा क्या लड़ पाएंगे
स्वयं ही स्वयं को भूल चुके नागरिक
सब अब तो बाजारवाद पर हैं आश्रित
लड़ते से अपनी ही प्रतिद्वंदिता के युद्ध
अब भिन्न प्रकार की सही लेकिन उस
चीनियों की भाँति अफ़ीम की पीनक में
संस्कृति, संस्कार, समाज सब से इतर
फिर से हैं दास मानसिकता के शिक़ार
कुशासन व व्यवस्था में सहमे स्वरों में
इनके भी योगदान कम नहीं हैं शायद
इन्हें ही अपने स्वरों को आवाज़ देनी है
सिर्फ नेपथ्य में न हो इनका ये नैराश्य

Monday, May 13, 2013

माँ

हर अच्छी बुरी बात में ही याद आती थी माँ
कभी डांटती भी पर ज्यादा पुचकारती थी माँ
दुलार और कौन देता है यहाँ माँ का जैसा कभी
प्यार और वात्सल्य बाक़ी तो बस माँ में अभी
लगता है ये बड़े होने की ऐसी क्या थी ज़ल्दी
माँ का घर क्या छूटा मानो ज़िन्दगी चल दी
जो सुकून था माँ के आँचल की छाँव में मिला
वो जीवन भर याद रहा पर बिछुड़ता ही चला
बड़ी नायाब थी वो ज़िन्दगी माँ के साये में पली
क़शमक़श में ज़िन्दगी की माँ भी है भूल चली

Monday, May 6, 2013

ज़िन्दगी से मोहब्बत / Love with Life

ज़िन्दगी के नाम पर मौत से भी लड़ते हैं कई दीवाने
मौत का डर नहीं मगर मौत से हमें नफरत सी हो गई
ज़िन्दगी को हर पल यूँ झंझटों से लड़ते जो देखा मैंने
दीवानों की तरह हमें भी ज़िन्दगी से मोहब्बत हो गई
To save life phrenetic are ready to fight even with death
I'm not scared of death yet I have started hating the death
When I observed lives fighting with so many complications
I have started loving the life like phrenetic as an aftermath

Sunday, May 5, 2013

सैलाब / Flood

सैलाब है इन आँखों में बसा न जाने कितने आँसू है लिए
कुछ तुम्हारे कुछ ज़माने के और कुछ खुद के भी हैं लिए
ये तुम्हारा नज़रिया है तुम्हें हमारे आँसू नज़र नहीं आते
वरना इन आँसुओं के समन्दर में तुम भी ज़रूर डूब जाते
These eyes have flood of don't know how many tears
Some by you some by the World and some my own fears
It's your own outlook that you can not witness tears
Even you can get drowned in the ocean of these tears

Friday, May 3, 2013

बेखयाल से ख़याल /thoughtless thought

रात जो आँखों में कटी थी नींद इंतज़ार में खो गई
कौन किसे क्यों खोजता था ये हिसाब में लग गई
रफ़्ता रफ़्ता ज़ेहन में ज़ज्बातों की झड़ी लग गई
बेखयाल से ख़यालों की मानो कोई बज़्म लग गई
Night passed with open eyes when sleep lost awaiting
Who was looking for whom and why busy calculating it
One after other emotions kept knocking peace of mind
Started pouring immensely rain of thoughtless thought

Thursday, May 2, 2013

Convergence May Hold Key for Effective Budgeting and Program Performance

Convergence May Hold Key for Effective Budgeting and Program Performance
Udaya Pant
One of the biggest problem areas often noticed in the countries’ national budgets and the budget performance in terms of expenditure outturn and outcomes of the layouts, in development spending. More so, in the countries that work on the cash budgeting and tight central controls on the budget releases. In practice they may already have prevailing multi-year procurement and commitments, yet calling them cash-budget (lapse at end of the year) system.

Funds Rationing Starves the Implementation Level and also Results in-Year Artificial Deficits
Commonly, even when the budget cycles are in place, the implementation level releases and actual expenditure on development programs gets released/authorized near the close of the financial year. This, on the one hand, gives the poor picture of the projected spending cycle; and on the other, it keeps the implementing agencies guessing and awaiting the release/authorization of funds till late in the financial year. It does result in the bunching of expenditure at the end of the year; and paves way for rush of expenditure, parking of funds and lack of prudent expenditure management.

On the macro-side it results in creating the artificial deficits (against projected cash flows) and adding to the cost of borrowing unnecessarily. Borrowing money in cash budget surplus scenario and for parking of funds (without actually spending the released amounts) is a cardinal sin in the traditional budgeting as well. In the contemporary budgetary practices also, the surrenders and supplementary requirements have to be anticipated well in advance; so as to provide for using the scarce resources for the overall budgetary performance.
We have on the one hand line ministries, planning bodies; and finance ministry sitting late over the desired releases of funds and also when they release funds that have to be close to the end of the year; leaving very little time for the spending units and implementing agencies to complete the processes and cycle of procurement of goods and services and make their optimum usage.

Allow Convergence but With Internal Controls and Accountability


Convergence, if it is allowed will work well by linking the allocations to the MTBF and MTEF in such scenario. Let the LM and the implementing agencies (like Local bodies) be allowed to make their spending plan based on the available total releases/authorizations at any given point of time. This would mean they are allowed to spend across the programs and projects out of their total amounts available at a given point of time all along the financial year. This would allow them to make temporary internal adjustments by utilizing amounts released for one program to the other.

At the end of the year, they have to balance out the total program/ project allocations as per the budget allocations; and if necessary vire the amounts where required. This will also imply that they are allowed to spend more (or less) than the annual budget allocations in specific program/project! This is the key issue that can be addressed by the active MTBF and MTEF systems. The total spending will have to be within the gross annual allocation and function/program based MTBF/MTEF allocations. The cash budget operating countries will have to fix the legal position accordingly in the advance.

For the implementing agencies like the local bodies, public corporations, municipalities etc the operational system is much simpler. The funds released to them for carrying out program/projects implementation, they will greatly benefit from the budget system allowing convergence. This will also allow them to have a good look at the outputs and outcomes that are redundant, duplicate and overlapping. Thus, providing synergy and better overall control on the development programs/projects and functions. The convergence of spending and outputs both will move in tandem.

Total Picture is Available at the Local Body’s level


As an example, a rural local body may be getting funds for spending under different programs/projects under different LM’s etc. At any point of time they may not have coordinated on the outputs and operational systems at work; leaving room for duplication and overlapping of the activities. The RLB shall be able to easily identify them and take a total picture in view while spending. This means that RLB will have to be allowed to link the program outputs and indicators and cross-subsidize the funds for synergy, with or without interfering with the budgetary allocations made by the LM’s.

Smooth Budget and Program Implementation

Overall, the scenario has to change with flexible spending allocations; with strict internal controls and performance reporting enabled. The fiscal oversight mechanism has to be close and accountability regime identifiable. With this in view, there is no doubt that the ’convergence budgeting and spending’ shall hold the key for smooth budget and program implementation. It may be a bit complicated for some countries with poor transparency; but they can also try out by starting from a sub-national entity or a local body to test this. The first step is to enable legal provision and provide adequate simple yet strong internal controls and accountability systems. Be clear, this is for facilitating budget execution not the budgeting! Budgeting shall remain within annual budget, MTBF and MTEF intact!

I know, there will be many issues and opinions on this; but I have no doubts that countries with intent of fixing the aforesaid problems can make use of this as a practical solution. It also empowers and makes the implementing agencies responsible for the implementation of development plan by providing them decentralized approach and powers to make flexible allocations and re-allocations. It will sure provide level-playing also for the ground levels!

शैलेन्द्र..at motivating best:)

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन,

सुबह औ' शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,

तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

हमारे कारवां का मंज़िलों को इन्तज़ार है,
यह आंधियों की, बिजलियों की पीठ पर सवार है,

तू आ क़दम मिला के चल, चलेंगे एक साथ हम,
मुसीबतों के सर कुचल, बढ़ेंगे एक साथ हम,

कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नज़र!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,

बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये,

गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

--------------------------------- {शैलेन्द्र}

Competitive Politics


So important are
The political systems
Inevitable are
The political rivalries
Backbone of politics
The political parties
No issues about
All those above
Bone of contention is
Competitive politics
That too for
Only party or individuals
Most important are
The national interests
Not as seen by parties
But by the people
People just need
Good governance
They need for society
Security and development
The aim is only
Livelihood and peace
Anything else
To serve these interests
The politicians are just
From among and by people
But why people fall prey
To competitive politics!

Wednesday, May 1, 2013

Not just appreciation

One this Labor Day
I want people to think
The toils and hard work
Of the Labor class is
Incomplete recognition
Without the contribution
Of all the women
All-around in families
And the households
With untiring dedication
In spite of all their odds
They make World smile
All they deserve is equity
The level playing roles
In all spheres everywhere
Not just appreciation!