Tuesday, April 28, 2015

फिर से


पत्थरों का शहर बनाया था
फूस सा ज़लज़ले ने उड़ाया
सुना न देखा था पहले कभी
क्या कोई अब फरियाद करेंगे
तिनकों का आशियाना था
देखते देखते उजड़ गया है
उजड़ा है चमन भीगे नयन
अब और क्या बर्बाद होंगे
फिर भी जान जब तक बाक़ी
लड़ेंगे सिर्फ शिक़वा न करेंगे
उम्मीद और मेहनत से हम
फिर से गुल-ए-गुलज़ार होंगे


Saturday, April 25, 2015

निराशा के बीच

आज न सही
तो कल होगी
देश की चिंता
फ़िलहाल तो हैं
सभी के यहाँ
घड़ियाली आँसू
अभी तो बस
उसकी अपनी ही है
किसान की चिंता
फसल बर्बाद हुई
तो खायेगा क्या
बेचकर आएगा कुछ
तो ज़रूरी चीजें लाएगा
जीवन यापन को
न बचा अगर
बीज तक को भी
मदद की जगह
नारे लगाने वाले मिले
तो और क्या करेगा
उधर तो चुका नहीं सकता
गुजारा कर नहीं सकता
निराशा के बीच बैठा
आत्महत्या कर बैठेगा
और कर भी क्या सकता है
इससे अधिक
मौसम का मारा !

Monday, April 20, 2015

परिणाम भी तुम्हारा अपना

पाले हैं शौक़ तुमने भी
बस पा लेने के
येन केन प्रकारेण
तुम्हारी तथाकथित
सोने की चिड़िया
मुझे तो संशय है
क्या बहला लेगी मन को
मेरी छोटी गौरैय्या की भाँति
तुम्हारी सोने की चिड़िया
या फिर शायद
तुम्हारी महत्वाकांक्षा
और धनाकांक्षा
अक्षुण्ण प्यास बन
हरे लेगी सब
मानसिक शांति तुम्हारी
निर्णय तुम्हारा है
परिणाम भी होगा
तुम्हारा अपना

कर्म प्रधान

धर्म प्रवर्तक जीते थे अपना जीवन
कर्म महान समझते थे वे फिर भी

ज्ञान-ध्यान का अपना है आलम
कर्म प्रधान होता है यहाँ फिर भी

कर्म-पथ पर भी बाधाएं हैं अनेक
बढ़ते रहना ही तो कर्म है फिर भी

कर्म का फल फलता-मिलता सदा
निष्काम कर्म श्रेष्ठ है यहाँ फिर भी

कर्म ही धर्म यहाँ होता है जिनका
सत्कर्म सद्बुद्धि है देता उनको भी


Friday, April 17, 2015

दूर से आती आवाज़ें

कहीं दूर से आती हैं
रहस्यमयी कभी
कभी खुलासा करती
कुछ जानी सी आवाज़ें
मानो रंगमंच में यहाँ
नेपथ्य से करता मदद
देकर संकेत मुझे
मेरे संवाद सुनाकर
खुसुर पुसुर से अपनी
याद दिला रहा हो
मेरे किरदार का भान
अनजानी नहीं लगतीं
शायद पहचानी सी
ये मेरे अंतर्मन की
या अन्तर्निहित होंगी
किसी से सुन संजोई
जिसकी भी हैं आवाज़ें

Thursday, April 16, 2015

क्रिया-विशेषण मात्र

आशावादी होने से नहीं
यथार्थ से नष्ट हुईं
सारी आशायें मेरी
फिर भी यक़ीनन
ग़म नहीं है मुझे
प्रेरणा देता रहा था
मेरा विश्वास सदा
और मेरा अन्तर्मन
बनाये रहता था
भरोसा मेरा सदा
स्वयं पर भी
और ज़माने पर भी
आशाओं का क्या!
बदलती रहती हैं
देश, काल, समय से
आशा-प्रत्याशा का क्रम
जीवन का सम्बल है
नियति का मतभेद है
नीयत के साथ सदा
नियति यदि कुछ नहीं
तो नीयत भी कुछ नहीं
बस क्रिया-विशेषण मात्र

Tuesday, April 14, 2015

क्या फ़र्क़ पड़ता है!

अब चिंतन और विचार
समसामयिक नहीं रहे
किन्तु फिर भी
इन्हें रोकना असंभव है
इनकी महत्ता लेकिन
बस मस्तिष्क तक है
किसी को फुर्सत नहीं
कहते हैं लोग
क्या फ़र्क़ पड़ता है
आज फिर नया
एक विचार आकर
चुपचाप निकल गया
दस्तक दे रहा है
मन में अब भी
पड़ा रहे किसी कोने में
क्या फ़र्क़ पड़ता है !

Sunday, April 12, 2015

असुंतलन ही क्रम

इन सुरों को समझो
लय, गति, ताल सब है
ज़िन्दगी की यहाँ
चाहो तो कर देख लो
व्यर्थ है कोशिश
तेज भागने की यहाँ
ज्ञात हो जाएगा
अपनी ही रफ़्तार है
ज़िन्दगी की यहाँ
एक समय आता है
ज्ञान, विवेक, दृष्टि
मिथ्या हो जाते हैं यहाँ
लाख कर लो कोशिश
असुंतलन ही क्रम है
संतुलन का यहाँ

Monday, April 6, 2015

With Contempt

Take it sportingly
As you did always
It's not yet over
I still depend on you
My utterances are
In the same spirit
With tease, fun or shun
Presuming as ever
That you understand
As you did always
The large caring heart
And the affection
I know you have
To laugh out loud
In your own ways
On my silly ways
As you always did
You inspired me
To be such witty
And with contempt
Without meaning hurt
And get pardoned
As you always did

Sunday, April 5, 2015

नशा सा

फिर मचलते हैं अरमां आज
हवा के झोंके संग
ऐसी खुशबू अब तक न थी
हवाओं में
जादू सा छाने लगा है
नस-नस में
ये किसने बेकस किया मुझको
कौन है जो तन मन में छाने लगा है
आके कोई मुझे बता भी दो
मैं हूँ इंतज़ार में
फिर मचलते हैं अरमां आज
आज मन भटकने लगा
दिल कहीं बहकने लगा
तन बदन मचलने लगा
जाने कैसा मीठा मीठा
आके कोई ठाम लो मुझे
नशा सा छाया है आज
फिर मचलते हैं अरमां आज

Friday, April 3, 2015

नन्हीं चिड़ियाँ


मुरझाई सी आशायें हैं लेकिन
खिलती हैं जीवन की कलियाँ
खिलती रहती हैं जीवन की कलियाँ
उसके जाते ही ऐसे
सब कुछ खाली खाली है
दिन बीते कट गई जैसे तैसे रतियाँ
पढ़कर बातों को उसकी
सुनकर सन्देश वो सारे
याद आती हैं वो सारी ही बतियाँ
देखो उसके कहने से
फिर आयीं हैं दर पे अपने
चीं चीं करती नन्हीं नन्हीं चिड़ियाँ
कैसा सँसार बनाया है
बस एक संदेशे से ही
मन के आँगन में महकी खुशियाँ

Wednesday, April 1, 2015

मन की बाज़ी

मुख्तलिफ रंग मिलेंगे यहाँ
इनको इनकी नज़र से देखना
चाबी ख़ुशियों की रख सँग सदा
खोल ताले सारे बढ़ते चलो
कुछ अपने भरोसे कुछ समय के
कामयाबी के पथ पर चलो
मंज़िलें मिलती जाएँगी यहाँ
सुर्खरू यूँ ही होते चलो
जीत कर हार को सबक से
जीत में हार की समझ से
अपने मन की सदा जीत हो
मन की बाज़ी यूँ जीते चलो
ज़िन्दगी के भी सुर ताल हैं
इसकी हर शै अपनी ही है
ज़िन्दगी की ही रफ़्तार से
ज़िन्दगी संग बढ़ते चलो