Monday, June 15, 2020

Covid19 coping

individuals
loss of opprtunities.. new jobs not coming, movements restricted
loss of jobs or reduced wages
uncertainties of all kinds
family income slide
women's empowerment recedes
schools and collges closed.students stranded at home
daily eage earnrrs worst hit
informal sectors losses
migrant labors stuck away from homes
prices risen

prioritise spending
alternative income
be prepared for job losses
develop new skills
work from home on new opportunities
scale down expenditure and try scaling up income
reverse migration is an opportunity to 'refresh'
work on anxity and stress management
srlf employment
agriculture
sericulture
horticulture
organic farming
cash crops
herbal and medicinal plants
homestays and rural tourism
small local industries
health sector supplies
trading and services
work on branding and marketing aspects
vooprratives and self-help groups
community empowerment
Art and Craft
Cottage Industries
Local self-reliance
Local Employment generation

Tuesday, June 2, 2020

Wins and Losses

Life is a zig zag journey
It's both smooth and hard
Walks randomly at own pace
Challenges will sure come
Facing them is being brave
Caution in bravity is essence
Withstanding them is success
Any problems have to resolve
Obstacles may keep surfacing
In one and everyone's life
Fearing problems no remedy
Facing them more important
Step out and witnrss others
Busy doing own duty or more
Winning situations may come
But at some small price too
But win is a defeat od losing
Loss or win both are temporaty
But permanent is your attitude
Equivocal in winning oe losing
But firm to learn from losing
And converting losses in wins 

Friday, May 15, 2020

बाक़ी हैं कहानियां

अब भी बाकी हैं कहानियां इस पार की
बंद घर में हैं पर छोड़ो बात ये बेकार की
ये सिर्फ़ चेतावनी है क्या हो व्यवहार की
दुनिया को क्या सिला बात से उस पार की
ज़लज़ले आए मग़र बात रही बस निशां की
कहर भी बरपा बात पर गुलज़ार ज़िंदग़ी की
हौसले हैं तो रोज़ ही ख़ुशबू वसंत बहार की
कोशिश करी जो वो कहूं न कहूं संसार की
हिम्मत कर ली अग़र क्या फि़क़र मंझधार की
आशियाने हों सुक़ूं के ज़रूरत नहीं व्यापार की
इसी पार मेरा जीवन और घड़ियां प्यार की
कैसे कहूं मैं बात इस पार या उस पार की 

आपदायें

आपदायें तो यहां आती जाती रहती हैं
दीगर बात ये है हम सीख क्या लेते हैं
कुछ आगे बढ़ कर हम भूलने लगते हैं
कि हम अब भी इसी समाज में रहते हैं
श्रम का महत्व भी हम तभी समझते हैं
जब झख़ मार के ख़ुद भी श्रम करते हैं
धनी होते ही हम धन पर दंभ करते हैं
कठिन समय में उपयोग सीमित पाते हैं
स्टेटस की मरीचिका रिश्ते भटकाती हैं
ज़रूरत पर रिश्ते नाते ही काम आते हैं
हम लेना तो जानते हैं देना कम चाहते हैं
ज़रूरतें औरों की अक़्सर कम मानते हैं
हम अपने काम से काम रखना चाहते हैं
औरों की फटी में टांग अड़ाना कम चाहते हैं
हम सिर्फ़ अपनी ही चिंता करना जानते हैं
हमारा भी ख़याल हो ये दूसरों से चाहते हैं
हम अपना व बाल-बच्चों का हक़ मांगते हैं
समाज, देश की चिंता औरों पर छोड़ते हैं
आपदा में भी हम ख़ुद की परवाह करते हैं
नहीं देखते दूसरे क्या हमारी ख़ातिर करते हैं
इस बार आपदा पहले से बड़ी हम मानते हैं
दीगर बात ये कि अब हम सीख क्या लेते हैं 

Sunday, May 10, 2020

मां

सब की तरह मेरी भी मां
सौ जतन कर पालती दुलारती थी
दुख हो सुख हो तकलीफ़ हो
शिक़वे शिक़ायत नहीं करती थी
मां का मन जैसा न भरता
देर रात तक बतियाती धी
बच्चों को आहट  से पहचानती
उनके मन की बात जानती थी
पिता के गुज़र जाने के बाद
मां अकेली किंतु जीवट वाली थी
वयस के साथ सब समझौते करती
मां फिर रुग्ण व कमज़ोर हो गई थी
मां अब सुन नहीं पाती
लेकिन समझ जाती थी
बिना सुने उत्तर देती
लगभग सटीक होता था
मां को बिस्मृति होती
पर पहचान ही जाती थी
वो अब भी दर्द छुपाती
बरबस मुस्कुरा देती थी
मां भजन भी गाती
दुआयें और भी देती थी
अपने सारे ग़म छुपाती
सब ख़ैर बताती रहती थी
मां जो अरमान सजाती
वो हमारी ख़ैर मांगती थी
कृशकाय असहाय सी
पर जीवन-गीत सिखाती थी
बिस्मय हो या कोई परेशानी हो
अब भी बरबस ही पुकार ते हैं
मांsss
मां सब कुछ ठीक कर सकती थी
हर मर्ज़ का एक ही इलाज़ मांsss!
सिर्फ देना ही जानती थी
मांगने में संकोच करती थी
हर हाल में संतोष रखती थी
सब की मां की ही तरह
मुझे हमेशा बच्चा समझती थी मां
अब यूं तो यादें ही शेष हैं
किंतु यहीं आस-पास लगती है मां!

Tuesday, April 28, 2020

World and Economies Beyond CORONA


The dredful impact of #Covid-19Pandemic will be in all walks of life. Besides health, morbidity, mortality and social impacts, it will cause tremedous fiscal stress on the economies of all countries.

The depression,  sluggishness of all industries;  and supply chain issies in the global markets may have multiple implications in livelihood, demand-supply and means gap. Fiscal space of theeconomies will be eaten up by addressing the emergency response to basic needs of the population, and fiscal stimuli based recovery efforts.

Adding to the woes, will be required packages to public and private companies and survival of the SME and informal sectors of economy. The resources and capital in economies would be already depleted in fighting war against the pandemic!

To reassure sustained income and employment generation, country specific measures will have to be taken. Social sector will have to be the top priority of the state,
There may be an opportunity to remedial actions for fixing the lopsided decisions and strategies. By now we all know that the concept of 'cities as engines of growth' has not met the real  expectations of of the economies. Unabated migration to cities and coming ip of ghost villages has brought the imbalance in growth. There may have been GDP groeth numbers; but on per capita, it would be a skewed result!

So where do we go from here? Decentralization of everything and development of self-reliance at local levels, at least in emergency situations, may be of key relevance. Globalization overemphasises on 'core-competence' in manufacturing, production and trade. In crisis situations, there may be breaking of supply chain for a variety of reasons.
The low- incremental outputs based infustrial and economic development policy may be a boon for reincarnation of revival of SME's and agro-based local industrialization, with jobs available to migrant workers locally. The resurgence of economic activity will have a multiplier effect on economy.

The hard budget constraints and scarce resources will have to make a balance between the 'austsrity' and 'prosperity' models in economic development and governance strategy, until the restoration of economy to reasonable levels and carry on the hybrid approach for all times, to address the crisis situations like now in future as well.
Innovative models of dealing with the problem will be important, with local adaptations in specifics geographical regions. The focus has to be on 'what suits and meets best' for the national and sub-national governments.
The new answers will emerge through experiene and concerted efforts of appropriate revenue and spending strategy, and perhaps by 'living wiyhin mans', for a decade. On top of economy, will be concers of survival against lethel and bio weapons. Having tasted the consequences, time is ripe to insulate the World collectively, against any misadventures!

Sunday, March 29, 2020

करो ना

चहचहा रहे हे हैं अब
विहग शांति राग में
वन्य जीव मस्त हैं
अपनी ही दुनियां में
प्रकृति सामंजस्य में है
समझने लगे हैं शायद
घरों में डरे सिमटे लोग
ज़हर उगलते शोर से
मोटरों के दुश्प्रभाव
अंथाधुंथ विकास की
दौड़ में समाये विनाश
क्षणभंगुर जीवन-राग
अपने स्वरों में जतलाते
खान-पान के व्यवहार
स्वस्थता के वृहत आयाम
और दूरियों में समझातीं
जीवन से नज़दीकियां
अब करने का समय है
करो न वरना कोरोना है!

Saturday, March 21, 2020

कोरोना

कोई कोहराम नहीं
बस ज़रा परेशानी है
अब है तो क़ोशिश हो
कोताही कतई न हो
अपना ख़याल रख के
औरों को महफ़ूज़ रखें
कोरोना है नये मिज़ाज़ का
बस इसे मिलके हराना है
हाथों को साफ़ करते रहें
चेहरे से दूर ही रखें
खान-पान सामान्य हो
कच्चा नहीं पका हो
कोई खांसी बुख़ार पर
डाक्टर की सलाह हो
जो बात इशारों से बने
अल्फ़ाज़ बचा लो
अभी कुछ दूरियां रहें
वही फिर पास लायेंगी
अभी कुछ अंधेरा सा है
भरी धूप खिलने वाली है
ऐहतियात से इत्मीनान रखें
कोरोना की चंद रोज़ में
ऐसी की तैसी होने वाली है 

Thursday, March 19, 2020

Some Times

Some times!
People must unite
For a greater cause
Shedding prejudices
Joining hands together
Proving we are human
Serving the humanity!

Some times!

Countries must  unite
Fight adversities together
Bury the agggression
Hatch the bonding
For a common cause
For our own World!

Some times!

Communities realize
Society must prevail
Hatred just derail
Proving us together
When needed the most
For a larger causel

Some times! 

Monday, February 17, 2020

मुस्कुराइये

अच्छी तो बढ़ाइये
बुरी भूल जाइये
छोटी बातों में है
बात बड़ी होने की
घाव नासूर बनेंगे
उपचार कीजिये
समय-सीमा है
हरेक बात की
सब बदल देगी
शुरूआत कीजिये
धीमी सी मुस्कान
एक नई सुबह की!

वापसी


फिर चलती तेज सर्द हवाओं के बीच
तुम्हारे वापस आने की खबर मुझे
एक गर्म मधुर सा एहसास करा गई
मानो कोई कुहासे को चीरती धूप सी
अँधेरे से निकाल प्रकाशमय करती
किसी पर्वत की मनोहर छटा को
बेरंग से नज़रों को रंगीन बनाती
मन में जीवंत उमंगों को जगाती
वातावरण में खुशबू बिखेरती सी
मेरे तन मन दोनों को हर्षाती हुई
जीवन के गीत फिर गाती हुई सी
तुम्हारे वापस आ जाने की खबर! 

Saturday, February 15, 2020

सुर्ख़रू

कल जिनका न था अपना कभी
उनका आज भी कल भी होगा
कल जिनका था चाहे आज नहीं
कल तो शायद उनका भी होगा
आज़ है जिनका सनद रहे उनको
कल क्या मालूम उनका न होगा
वक्त भुला भी देना चाहे सब कुछ
उसकी फ़ितरत में भूलना न होगा
ये पहिया वक्त का चलता रहेगा
जो समझ गया वही सुर्ख़रू होगा 

Sin of Wins

Weird are the ways
Of people and World
To save own progress
Cut throats of others
It same goes for food
Killing others make meals
And they expect harmony
And inner peace
Carrying loads of guilt
Over time that's built
Unaware of sin of wins
And say all is fair to win!