Wednesday, May 21, 2014

ख़ून के घूँट

हम ज़माने पर हँस पड़ते हैं
कभी लोग हम पर हँसते हैं
नासमझ नहीं समझते हैं
बारीकियाँ ज़िन्दगी की हैं
कुछ तो बस हमसे परे हैं
कुछ उलझनें पाल ली हैं
कुछ लोग कम समझते हैं
कुछ हम न समझ पाते हैं
मशरूफ़ इस तरह हुए हैं
बस सब हाल ही बेहाल हैं
दिन यहाँ छोटे लगते हैं
रात बड़ी लम्बी हो गई हैं
कभी कभी झल्ला पड़ते हैं
कभी ख़ून के घूँट पी लेते हैं
जीने की ख़्वाहिश रखते हैं
बस किसी तरह जी लेते हैं


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