Tuesday, October 5, 2010

हमसफ़र

तुम मुझे मेरी तस्वीर से मत आंकना
मैंने भी संजोया है एक सुन्दर सपना
अगर हो सके तुमसे तो फिर ज़रा
कोशिश करके मेरे अन्दर झांकना
मन के मिलन की कुछ बात अलग है
ये तुम अपने मन को भी समझाना
दूरियां तो रहेंगी ये है एहसास मुझको
करीब आने की कोशिश ज़रा करना
राही हैं सफ़र के हम दोनों भी यहाँ
हमसफ़र ही हमें भी समझ लेना

2 comments:

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

सही कहा आपने.. इस दुनिया में हम सभी तो हमसफ़र है... कब और कहा सफ़र सुरु होता है और कब ख़तम कुछ पता नहीं.......किन्तु आपकी कविता बहुत सुन्दर है..उम्दा

sranil66 said...

सर ! मैं तो आपकी लेखनी और काव्य प्रतिभा एवं प्रवत्ति का हमेशा से कायल रहा हूँ ! आपकी नई कविताओं में विरह, व्यंग्य, चेतना,आक्रोश एवं सकारात्मक सोच की लौ देखकर दंग हूँ ! बहुत - बहुत बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं