Monday, February 18, 2013

फेहरिस्त

हाँ याद करता था कही मैं भी इधर
मेरा भी कोई मुक़ाम था मंज़िल थी
अनज़ान रास्ते मेरे भी अज़ीज़ थे
मेरे भी कोई खैरख्वाह और मुरीद थे
हर साँस मेरी महकी महकती थी
हर धड़कन में संगीत सा बजता था
वक़्त कब गुज़रा ये मालूम नहीं था
वक़्त के हर पल का हिसाब पता है
मुझे और कोई यहाँ दिलचस्पी नहीं
अब तो मैं बस फेहरिस्त बनाता हूँ
कि कब क्या खोकर क्या पाया था
और कब क्या पाकर क्या खोया है

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