Thursday, February 24, 2011

फलसफे

उनकी नज्मों को पढ़ लेने से यूँ लगा
हमें तो उल्फत बस कभी हुई ही नहीं
उनकी बेवाकी को देख के यूँ लगा
हमने जुबान ये कभी खोली नहीं
क़ह्क़हों को उनके सुना तो लगा
हम कभी जी भर के हँसे भी नहीं
हसरतें उनकी देख के लगने लगा
हमने तो कभी कुछ चाहा ही नहीं
इश्क के फलसफे उनके पढ़के लगा
हमारी तालीम अभी शुरू ही न हुई
लाख कोशिशों पर उन्होंने क़बूला
ये नज्में ख़ुद पे फ़क़त लागू न हुईं

3 comments:

Anil Arya said...

बहुत खूब उदय जी, हालाँकि कुछ कठिन शब्दों का अर्थ अभी पता करता हूँ, फिर भी मजा ही आ गया ..

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बहुत सुन्दर लिखा है उदय जी... वाह ...

Udaya said...

@Anil &Nutan: many thanks:)