Saturday, February 18, 2012

उधार

सूरज रोज़ अपनी दिन भर की रौशनी बिखराने के बाद
चाँद को सौंप अपनी रौशनी अपना मंतव्य दिखलाता है
चाँद अपने इस उधार की चांदनी पर भी यूँ इतराता है
उसे मालूम है कि फिर रात होगी और चांदनी छिटकेगी
बहुत दूर के तारों की रौशनी हम तक पहुँचती कम सही
वे टिमटिमाकर हमारे संग संग मुस्कुराते से लगते हैं
हम रोज़ कुछ न कुछ सभी से ले लेने की कोशिश में हैं
जाने कितने लोग फिर भी हमें बेहतर बनाने में जुटे हैं

No comments: