Thursday, July 24, 2014

सब अपनी

कुछ उज़ली हैं
कुछ धूमिल सी
स्मृति की रेखायें
मेरे बचपन की
जाने क्यों लेकिन
सब बिसरी सी हैं
प्रायः वो बातें
मेरे यौवन की
बातें कुछ शायद
इस जग की
मेरे कर्तव्यों की
इधर भारी सी हैं
फिर भी जीवंत
सदा कण-कण में
जीवन की गाथा
बस प्यारी सी हैं
अब ढलती वयस्
इसके अपने आयाम
जो भी स्मृति होंगी
सब अपनी ही हैं

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